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Monday, 7 November 2011

Tere Pehlu me dooja dekhne ko yahi ik din bacha tha dekhne ko Aadil Rasheed

Tere pehlu me dooja dekhne ko
Yahi ik din bacha tha dekhne ko 
तेरे पहलू में दूजा देखने को
यही इक दिन बचा था देखने को
ترے پہلو میں دوجا دیکھنے کو
یاک دن بچا تھا دیکھنے کو
बहुत इग्नोर मुझको कर रहे हो
तरस जाओगे चेहरा देखने को
بہت اگنور مجھکو کر رہے ہو
ترس جاؤگے چہرہ دیکھنے کو
लिए बैठे हो अब पथराई आंखे
कहा किसने था रस्ता देखने को
لۓ بیٹھے ہو اب پتھرائی آنکھیں
کہا کس نے تھا رستہ دیکھنے کو
गंवा बैठे हो अब बीनाई अपनी
मरे जाते थे जलवा देखने को
گنوا بیٹھے ہو اب بینائ اپنی
مرے پاتے تھے جلوہ دیکھنے کو
भला शीशा बदन को यूं बरहना
तुम्हें किस ने कहा था देखने को
بھلا شیشہ بدن کو یوں برہنہ
تمہیں کس نے کہا تھا دیکھنے کو 
मुझे तन्हा समझने वाले आदिल
ज़माना है तमाशा देखने को 
مجے تنہا سمجھنے والے عادل
زمانہ ہے تماشا دیکھنے کو
عادل رشید आदिल रशीद
 Aadil Rasheed

Monday, 31 October 2011

पहले सच्चे का वहिष्कार किया जाता है /आदिल रशीद


                      ग़ज़ल


पहले सच्चे का वहिष्कार किया जाता है
फिर उसे हार के स्वीकार किया जाता है

ज़हर में डूबे हुए हो तो इधर मत आना
ये वो बस्ती है जहाँ प्यार किया जाता है

क्या ज़माना है के झूटों का तो सम्मान करे
और सच्चों का तिरस्कार किया जाता है

तू फ़रिश्ता है जो एहसान तुझे याद रहे
वर्ना इस बात से इनकार किया जाता है

जिस किसी शख्स के ह्रदय में कपट होता है
दूर से उसको नमस्कार किया जाता है


आदिल रशीद
नई दिल्ली
 भारत





मुहावरा ग़ज़ल : आज थोड़ी है/aadil rasheed


                ग़ज़ल


कल जो राइज था आज थोड़ी है
अब वफ़ा का रिवाज थोड़ी है


जिंदगी बस तुझी को रोता रहूँ
और कोई काम काज थोड़ी है


दिल उसे अब भी बावफा समझे
वहम का कुछ इलाज थोड़ी है


आप की हाँ में हाँ मिला दूंगा
आप के घर का राज थोड़ी है


है ज़रुरत तुझे दुआओं की
मय ग़मों का इलाज थोड़ी है

वो ही क़ादिर है वो बचा लेगा
अपने हाथों में लाज थोड़ी है


वो ही हाजित रवा है राज़िक़ है
तेरी मुट्ठी में नाज थोड़ी है

उस की यादों से पार पद जाए
हर मरज़ का इलाज थोड़ी है


दाद है ये  हमारी ग़ज़लों की
एक मुट्ठी अनाज थोड़ी है


उम्र भी देखो हरकतें देखो
उसको कुछ लोक लाज थोड़ी है


प्यार को प्यार ही समझ लेगा
इतना अच्छा समाज थोड़ी है


मैं शिकायत किसी से कर बैठूं
मेरा ऐसा मिज़ाज थोड़ी है


शायरी छोड़ देंगे इक दिन हम
ये मरज़ ला इलाज थोड़ी है

राइज ( चलन ) (मय =मदिरा,शराब)
(क़ादिर =सर्वशक्तिमान इश्वर )
(हाजित रवा=ज़रुरत पूरी करने वाला,
(राज़िक़=अन्नदाता )

मुहावरा ग़ज़ल = पालते रहना /आदिल रशीद/aadil rasheed


            ग़ज़ल


ख्वाब आँखों में पालते रहना
जाल दरिया में डालते रहना


जिंदगी पर किताब लिखनी है
मुझको हैरत में डालते रहना


और कई इन्किशाफ़ होने हैं     
तुम समंदर खंगालते रहना


ख्वाब रख देगा तेरी आँखों में
ज़िन्दगी भर संभालते रहना


 तेरा दीदार मेरी मंशा  है      
उम्र भर मुझको टालते रहना


जिंदगी आँख फेर सकती है
आँख में आँख डालते रहना


तेरे एहसान भूल सकता हूँ
आग में तेल डालते रहना


मैं भी तुम पर यकीन कर लूँगा
तुम भी पानी उबालते रहना


इक तरीक़ा है कामयाबी का
खुद में कमियां निकलते रहना

इन्किशाफ़ =खुलासा
मंशा =इच्छा मर्ज़ी

वफ़ा ,इखलास , ममता ,भाई चारा छोड़ देता है /Aadil Rasheed


                           ग़ज़ल


वफ़ा ,इखलास , ममता ,भाई चारा छोड़ देता है
तरक्की के लिए इन्सान क्या क्या छोड़ देता ही



तडपने के लिए दिन भर को प्यासा छोड़ देता है
अजां होते ही वो किस्सा अधुरा छोड़ देता है

किसी को ये जुनू बुनियाद थोड़ी सी बढ़ा लूँ मैं
कोई भाई की खातिर अपना हिस्सा छोड़ देता है


सफर में ज़िन्दगी के लोग मिलते हैं बिछड़ते हैं
किसी के वास्ते क्या कोई जीना छोड़ देता है


हमारे बहते खूं में आज भी शामिल है वो जज्बा
अना की पास्वानी में जो दरिया छोड़ देता हैं

सफर में ज़िन्दगी के मुन्तजिर हूँ ऐसी मंजिल का
जहाँ पर आदमी ये तेरा - मेरा छोड़ देता है


अभी तो सच ही छोड़ा है जनाब- ऐ -शेख ने आदिल
अभी तुम देखते जाओ वो क्या क्या छोड़ देता है
इखलास=ख़ुलूस,  अजां =अज़ान,  अना =स्वाभिमान,
पास्वानी= सुरक्षा , मुन्तजिर=इन्तिज़ार


न दौलत जिंदा रहती है न चेहरा जिंदा रहता है/aadil rasheed


                        ग़ज़ल

न दौलत जिंदा रहती है न चेहरा जिंदा रहता है
बस इक किरदार ही है जो हमेशा जिंदा रहता है

कभी लाठी के मारे से मियां पानी नहीं फटता
लहू में भाई से भाई का रिश्ता जिंदा रहता है

ग़रीबी और अमीरी बाद में जिंदा नहीं रहती
मगर जो कह दिया एक एक जुमला जिंदा रहता है

न हो तुझ को यकीं तारीखएदुनिया पढ़ अरे ज़ालिम
कोई भी दौर हो सच का उजाला जिंदा रहता है

अभी आदिल ज़रा सी तुम तरक्की और होने दो
पता चल जाएगा दुनिया में क्या क्या जिंदा रहता है

जुमला=वाक्य तारीख-ए-दुनिया=इतिहास दुनिया का


आदिल रशीद

आज का बीते कल से क्या रिश्ता/ aadil rasheed


               ग़ज़ल


आज का बीते कल से क्या रिश्ता
झोपडी का महल से क्या रिश्ता


हाथ कटवा लिए महाजन से
अब किसानो का हल से क्या रिश्ता


सब ये कहते हैं भूल जाओ उसे
मशवरों का अमल से क्या रिश्ता


किस की खातिर गंवा दिया किसको
अब मिरा गंगा जल से क्या रिश्ता


जिस में सदियों की शादमानी हो
अब किसी ऐसे पल से क्या रिश्ता


जो गुज़रती है बस वो कहता हूँ
वरना मेरा ग़ज़ल से क्या रिश्ता


जिंदा रहता है सिर्फ पानी में
 रेत का है कँवल से क्या रिश्ता


मैं पुजारी हूँ अम्न का आदिल
मेरा जंग ओ जदल से क्या रिश्ता 

जंग ओ जदल =लड़ाई झगडा


आदिल रशीद

तुम्हारे ताज में पत्थर जड़े हैं/aadil rasheed




तुम्हारे ताज में पत्थर जड़े हैं
जो मोती हैं वो ठोकर में पड़े हैं

उडाने ख़त्म कर के लौट आओ
अभी तक बाग़ में झूले पड़े हैं


मिरी मंजिल नदी के उस तरफ है
मुक़द्दर में मगर कच्चे घड़े हैं


ज़मीं रो रो के सब से पूछती है
ये बादल किस लिए रूठे पड़े हैं


किसी ने यूँ ही वादा कर लिया था
झुकाए सर अभी तक हम खड़े हैं


महल ख्वाबों का टूटा है कोई क्या
यहाँ कुछ कांच के टुकड़े पड़े हैं


उसे तो याद हैं सब अपने वादे
हम ही हैं जो उसे भूले पड़े हैं


ये साँसे ,नींद ,और ज़ालिम ज़माना
बिछड़ के तुम से किस किस से लड़े हैं


मैं पागल हूँ जो उनको टोकता हूँ
मिरे अहबाब  तो चिकने घड़े हैं  


तुम अपना हाल किस से कह रहे हो
तुम्हारी अक्ल पर पत्थर पड़े हैं


अहबाब= यार- दोस्त


आदिल रशीद

उसे तो कोई अकरब काटता है/

               ग़ज़ल
उसे तो कोई अकरब काटता है

कुल्हाड़ा पेड़ को कब काटता है

जुदा जो गोश्त को नाखुन से कर  दे
वो मसलक हो के मशरब काटता है

बहकने का नहीं इमकान कोई
अकीदा सारे करतब काटता है

कही जाती नहीं हैं जो जुबां से
उन्ही बातों का मतलब काटता है

वो काटेगा नहीं है खौफ इसका
सितम ये है के बेढब काटता है

तू होता साथ तो कुछ बात होती
अकेला हूँ तो मनसब काटता है

जहाँ तरजीह देते हैं वफ़ा को
जमाने को वो मकतब काटता है

उसे तुम खून भी अपना पिला दो
मिले मौका तो अकरब काटता है

ये माना सांप है ज़हरीला बेहद
मगर वो जब दबे तब काटता है

अलिफ़,बे.ते.सिखाई जिस को आदिल
मेरी बातों को वो अब काटता है

अकरब=निकटतम व्यक्ति, 
गोश्त= मांस,
मसलक-मशरब=धर्म मज़हब
इमकान= उम्मीद,
अकीदा= यकीन विश्वास 
करतब =जादू टोना
मनसब= ओहदा पद ,
तरजीह=प्राथमिकता,
मकतब=स्कूल

आदिल रशीद
meri aur ghazlon ke liye is link par click karen.......
For urdu
http://www.aadil-rasheed.blogspot.com/

मुहावरा ग़ज़ल /गिर के उठ कर जो चल नहीं सकता/ aadil rasheed


 
गिर के उठ कर जो चल नहीं सकता
वो कभी भी संभल नहीं सकता


तेरे सांचे में ढल नहीं सकता
इसलिए साथ चल नहीं सकता


आप रिश्ता रखें, रखें न रखें
मैं तो रिश्ता बदल नहीं सकता


वो भी भागेगा गन्दगी की तरफ
मैं भी फितरत बदल नहीं सकता


आप भावुक हैं आप पागल हैं
वो है पत्थर पिघल नहीं सकता


इस पे मंजिल मिले , मिले न मिले
अब मैं रस्ता बदल नहीं सकता


तुम ने चालाक कर दिया मुझको
अब कोई वार चल नहीं सकता

इस कहावत को अब बदल डालो
खोटा सिक्का तो चल नहीं सकता 


आदिल रशीद


रूहों ने शहीदों की फिर हमको पुकारा है/ aadil rasheed


इन फिरकापरस्तों की बातों में न आ जाना
मस्जिद भी हमारी है , मंदिर भी हमारा है
पर   50  रूपये पुरस्कार के रूप में दिए , जो मेरे जीवन में एक अमूल्य पुरस्कार और सम्मान है बाद में कुछ हिंदी कवियों ने मेरे सम्मान में एक कार्यक्रम रखा और एक शाल भेट की तो कई आदरणीय बुज़ुर्ग उर्दू शायरों ने उस कार्यक्रम का बहिष्कार किया
              ग़ज़ल

रूहों ने शहीदों की फिर हमको पुकारा है
सरहद की सुरक्षा का अब फ़र्ज़ तुम्हारा है

हमला हो जो दुश्मन का हम जायेगे सरहद पर
जाँ देंगे वतन पर ये अरमान हमारा है

इन फिरकापरस्तों की बातों में न आ जाना
मस्जिद भी हमारी है , मंदिर भी हमारा है

ये कह के हुमायूं को भिजवाई थी इक राखी
मजहब हो कोई लेकिन तू भाई हमारा है

अब चाँद भले काफिर कह दें ये जहाँ वाले
जिसे कहते हैं मानवता वो धर्म हमारा है

आदिल रशीद
[नोट ;शुरू में मेरी रचनाएं चाँद तिलहरी एव चाँद मंसूरी के नाम से प्रकाशित हुई है]

बाज़ कहाँ आता है दिल मनमानी से/ aadil rasheed


आदिल रशीद 
सारी दुनिया देख रही
हैरानी से
हम भी हुए हैं इक गुड़िया जापानी से
 

बाँट दिए बच्चों में वो सारे नुस्खे
माँ  ने जो भी कुछ सीखे थे नानी से 


ढूंढ़ के ला दो वो मेरे बचपन के दिन
जिन  मे 
कुछ सपने हैं धानी-धानी से

प्रीतम से तुम पहले पानी मत पीना
ये मैं ने सीखा है राजस्थानी से
 

मै ने कहा था प्यार के चक्कर में मत पड़
बाज़ कहाँ आता है दिल मनमानी  से
 

बिन तेरे मैं कितना उजड़ा -उजड़ा हूँ
दरिया की पहचान फ़क़त है पानी से
 

मुझ से बिछड़ के मर तो नहीं जाओगे तुम
कह तो दिया ये तुमने बड़ी आसानी से
 

पिछली रात को सपने मे कौन आया था
महक रहे हो आदिल रात की रानी से

आदिल रशीद 
Aadil Rasheed
New Delhi





के दरिया बहने लगा खतरे के निशान के साथ/ आदिल रशीद


के जैसे रहता है आईना इक चटान के साथ

ज़मीं भी करने लगी अब दुआ किसान के साथ
के दरिया बहने लगा खतरे के निशान के साथ

है तेरे हाथ मे अब लाज उसकी रब्बे करीम
परिन्दा शर्त लगा बैठा आसमान के साथ

कहीं ये बढ़  के मेरा हौसला न कत्ल करे
तभी तो जंग छिडी है मेरी थकान के साथ

हम ऐसे लोग भला कैसे नींद भर सोयें
के जाग  उठती हैं फिक्रें मियां अज़ान के साथ

वो जिसके सामने दरिया ने नाक रगड़ी है
हमारा रिश्ता है उस आला खानदान  के साथ

गरीब होने से तहज़ीब मर नहीं सकती
वो चीथडों मे भी रहता है आन बान के साथ

अपने हर कौल से, वादे से पलट जाएगा.. aadil rasheed

अपने हर कौल से, वादे से पलट जाएगा..

ग़ज़ल
अपने हर कौल से, वादे से पलट जाएगा
जब वो पहुंचेगा बुलंदी पे तो घट जाएगा

अपने किरदार को तू इतना भी मशकूक न कर
वर्ना कंकर की तरह से दाल से छट जाएगा

जिसकी पेशानी तकद्दुस  का पता देती है
जाने कब उस के ख्यालों से कपट जाएगा

उसके बढ़ते हुए क़दमों पे कोई तन्ज़ न कर
सरफिरा है वो,  उसी वक़्त पलट जाएगा

क्या ज़रूरी है के ताने रहो तलवार सदा
मसअला घर का है बातों से  निपट जाएगा

आसमानों से परे यूँ तो है वुसअत उसकी
तुम बुलाओगे तो कूजे में सिमट जाएगा  
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आज का बीते कल से क्या रिश्ता /aaj ka beete kal se kya rishta/aadil rasheed

आज का बीते कल से क्या रिश्ता
झोपड़ी का महल से क्या रिश्ता

हाथ कटवा लिए महाजन से
अब किसानों का हल से क्या रिश्ता

सब ये कहते हैं भूल जाओ उसे
मशवरों का अमल से क्या रिश्ता

किस की ख़ातिर गँवा दिया किसको
अब मिरा गंगा-जल से क्या रिश्ता

जिस में सदियों की शादमानी हो
अब किसी ऐसे पल से क्या रिश्ता

जो गुज़रती है बस वो कहता हूँ
वरना मेरा ग़ज़ल से क्या रिश्ता

ज़िंदा रहता है सिर्फ़ पानी में
रेत का है कँवल से क्या रिश्ता

मैं पुजारी हूँ अम्न का आदिल
मेरा जंग ओ जदल से क्या रिश्ता
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जंगो जदल/jango jadal/جنگ و جدل/ شادمانی/ शादमानी/ shadmaani/shaadmani  

हम जो हिन्दोस्तान से जाते / ham jo hindostan se jaate /aadil rasheed


हम जो हिन्दोस्तान से जाते 
बच गए नाक कान  से जाते 

बेवफा होना क्या ज़रूरी था 
किस ने रोका था शान से जाते 

आप हम को अगर नहीं मिलते 
हम तो कोरे जहान से जाते 

हाँ में हाँ ने बचा लिया हमको
सच जो कहते तो जान से जाते 

जो बन संवर के वो एक माहरू निकलता है /आदिल रशीद /aadil rasheed

जो बन संवर के वो एक माहरू निकलता है /आदिल रशीद /aadil rasheed

जो बन संवर के वो एक माहरू निकलता है  
तो हर ज़बान से  बस अल्लाह हू निकलता है
 

ये चाँद रात ही दीदार का वसीला है
बरोजे ईद ही वो खूबरू निकलता है


हलाल रिज्क का मतलब किसान से पूछो
पसीना बन के बदन से लहू निकलता है


ज़मीन और मुक़द्दर की एक है फितरत
के जो भी बोया वही  हूबहू  निकलता है



तेरे बग़ैर गुलिस्ताँ को क्या हुआ आदिल
जो गुल निकलता है बे रंगों बू  निकलता है 

आदिल रशीद 

माहरू= सुन्दर चाँद जैसे चेहरे वाला
अल्लाह हू = हे भगवान् 

रिज्क= रोजी,रोटी   

आदिल रशीद 

भरम उसकी शराफत का न खुल जाए वो डरता है /aadil rasheed

भरम उसकी शराफत का न खुल जाए वो डरता है /aadil rasheed

भरम  उसकी  शराफत  का  न  खुल  जाए  वो  डरता  है
सहारा  ले  के  गैरों  का  वो  मुझ  पर  वार  करता  है

समझ  में  आ  सकेगा   किस  तरह  ये  मसअला यारो 
जो  शब्  का  क़त्ल  होता   है  तो  इक  सूरज  उभरता  है


कोई  तद्फीन  हो  घर  में , किसी  अपने की  शादी  हो
ये  मत  पूछो  वो  दिन  परदेस  में  कैसे  गुज़रता  है

मिरे  अशआर  कुछ  लोगों  को  खुद  पर  तन्ज़  लगते  हैं 
जहाँ  पर  गड्ढा  होता  है  वहीँ  पर  पानी  मरता  है

तद्फीन = मुर्दा दफ्न करना, अंतिम क्रिया
अशआर = शेर का बहुवचन 
शब् = रात 

तन्ज़ =व्यंग   

bharam uski sharafat ka na khul jaaye wo darta hai
sahara le ke gairon ka wo mujh par waar karta hai

samajh men aa sakega kis tarah ye masala yaaro
jo shab ka qatl hota hai to ik sooraj ubharta hai


koi tadfeen ho ghar men, kisi apne ki shaadi ho
ye mat poochho wo din pardes men kaise guzarta hai

mire ashaar kuchh logon ko khud par tanz lagte hain
jahan par gaddha hota hai wahin par pani marta hai






रज़ा महबूब की हम जैसे कुछ पागल समझते हैं /आदिल रशीद / aadil rasheed

रज़ा महबूब की हम जैसे कुछ पागल समझते हैं /आदिल रशीद / aadil rasheed

रज़ा = मर्जी,इच्छा,   पीर =सोमवार 
रज़ा महबूब की हम जैसे कुछ पागल समझते हैं 
अगर वो पीर को मंगल कहे मंगल समझते है

जो  तुझ  से  दूर  हो  वो  जिंदगी  भी  जिंदगी  कब  है  
जो तेरे साथ में गुज़रे उसी को पल समझते हैं 


किसी ने यूँ ही वादा कर लिया था पीर मंगल का 
उसी दिन से हर इक दिन पीर और मंगल समझते हैं

उन्हें  तो हुक्म की तामील हर हालत मे करनी है  
कहाँ कितना बरसना है ये क्या बादल समझते हैं 


ये जनता सब समझती है के उनकी खूबियाँ क्या हैं 
मगर वो हैं के सब को अक्ल से पैदल समझते हैं
  
कहाँ हैं पहले जैसी खासियत के लोग दुनिया मे
जो नकली सांप हैं  कीकर को भी संदल समझते हैं
राजा = मर्जी,इच्छा, पीर =सोमवार  

 

raza mehboob ki ham jaise kuchh pagal samajhte hain
agar wo peer ko mangal kahen mangal samajhte hain

jo tujh se door ho wo zindagi bhi zindagi kab hai
jo tere saath me guzre usi ko pal samajhte hain

kisi ne yun hi wada kar liya tha peer mangal ka
usi din se har ik din peer aur mangal samajhte hain

unhe to hukm ki tameel har halat me karni hai
kahan kitna barasna hai ye kya baadal samjhte hain

ye janta sab samajhti hai ke unki khoobiyan kya hain
magar wo hain ke sab ko aqal se paidal samajhte hain

kahan hain pehle jaisi khasiyat ke log duniya me
jo naklee saanp hain keekar ko bhi sandal samajhte hain

१२ मई 1994




फैज़ अहमद फैज़ कि ज़मीन में एक तरही ग़ज़ल/faiz ahmad faiz ki zameen me ek

tarahi ghazal/aadil rasheed 


फैज़ अहमद  फैज़  कि  ज़मीन  में  एक  तरही ग़ज़ल 

जो  खून  ए  दिल  में  डुबो  ली  हैं  उँगलियाँ  मैं  ने  
लिखी  है  तब  कहीं  ज़ुल्मों  की  दास्ताँ  मैं  ने  

वहीँ  वहीँ  पे सजी  पाई  कहकशां  मैं  ने  
तुम्हारा  नाम  लिया  है  जहाँ  जहाँ  मैं  ने  

कहीं  मिले  ही  नहीं  फिर  वो  पुर  सुकुं  लम्हे  
उन्हें  तलाश  किया  है  कहाँ  कहाँ  मैं  ने  

मुझे  ये  दार ओ रसन उस का ही तो तोहफा है 
रखीं थी  नब्ज़  ए  ज़माना  पे  उँगलियाँ  मैं  ने  

हवा  के  साथ  में  कुछ  फिक्रें  भी  चली  आईं
ज़रा  सी  जेहन  की  खोली  जो  खिड़कियाँ  मैं  ने  

मिरा  वजूद  बिखर  जायेगा  पता  था  मुझे 
मगर  गुरूर  की  कर  दी   हैं  धज्जियाँ  मैं  ने  

ग़ज़ल  का  लहजा  मिरा  यूँ  भी  तल्ख़  है  आदिल 
पढ़ी  है  हजरते साहिर  की  "तल्खियाँ " मैं  ने 

दार ओ रसन= फांसी का फंदा,सलीब,फांसी का तख्ता
कहकशां= आकाश गंगा ,glaxy 
तल्ख़= कड़वा 
 तल्खियाँ साहिर लुधियानवी के ग़ज़ल संग्रह का नाम है

आदिल रशीद  

فیض احمد فیضؔ کی زمین میں ایک طرحی غزل

جو خون دل میں ڈبولی ہیں انگلیاں میں نے
لکھی ہے تب کہیں ظلموں کی داستاں میں نے

وہیں وہیں پہ سجی پائی کہکشاں میں نے
تمہارا نام لیا ہے جہاں جہاں میں نے

کہیں ملے ہی نہیں پھر وہ پر سکوں لمحے
انہیں تلاش کیا ہے کہاں کہاں میں نے

مجھے یہ دار و رسن اس کا ہی تو تحفہ ہے
رکھی تھیں نبض زمانہ پہ انگلیاں میں نے

ہوا کے ساتھ میں کچھ فکریں بھی چلی آئیں
ذرا سی ذہن کی کھولیں جو کھڑکیاں میں نے

مرا وجود بکھر جائے گا پتہ تھا مجھے
مگر غرور کی کر دی ہیں دھجیاں میں نے

غزل کا لہجہ مرا یوں بھی تلخ ہے عادلؔ 
پڑھی ہے حضرت ساحرؔ کی’’ تلخیاں‘‘ میں نے 

عادل رشید

faiz ahmad faiz ki zameen me ek tarahi ghazal

jo khoon e dil me dubo li hain ungliyan main ne 
likhi hai tab kahin zulmon ki dastan main ne 

wahin wahin pe saji payi kehkashan main ne 
tumhara nam liya hai jahan jahan main ne 

kahin mile hi nahin phir wo pur sukun lamhe 
unhen talash kiya hai kahan kahan main ne 

mujhe ye dar o rasan is baat ka hi to tohfa hai
rakhi thi nabz e zamana pe ungliyan main ne 

hawa ke saath me kuchh fikren bhi chali aayin
zara si zehn ki kholi jo khidkiyan main ne 

mira wajood bikhar jayega pata tha mujhe
magar guroor ki kar di hain dhajjiyan main ne 

ghazal ka lehja mira yun bhi talkh ha aadil
padhi hai hazrat e SAHIR ki "talkhiyan" main ne 
aadil rasheed